Sunday, 23 September 2018

पूछे विक्रम, बोले बेताल - 11



11. “बस यूँ ही...”

अफ़लातून

उस दिन बेताल और विक्रम शहर में ही टहल रहे थे. अचानक एक घर के सामने भीड़ देखकर विक्रम ने पूछा:
“यहाँ क्या हुआ है, बेताल? कोई अनहोनी?”
“नहीं, विक्रम, भीड़ तो किसी भी कारण से जमा हो जाती है. इस घर में एक ख़ुशी की बात हुई है!”
“फिर, ये पुलिस, कैमेरे वाले...?”
“चलो, राजाजी, तुम्हें पूरी बात बताता हूँ, बस, मुझे बीच में टोकना नहीं और कोई सवाल भी नहीं पूछना...”
 विक्रम ने हाँ कर दी.

बेताल बताने लगा:
“ये घर सव्यसाची का है. सव्यसाची बड़ा आदमी है – एक बड़ी कम्पनी का मैनेजिंग डाइरेक्टर. मल्टीनेशनल कम्पनी का डाइरेक्टर होना कोई मज़ाक की बात नहीं होती. अनेक योग्यताओं के साथ ही बिना थके, बिना रुके कार्य करने की क्षमता होना अत्यंत आवश्यक है. रुके तो, सुस्ताए तो, न जाने कब मार्केट के उस अजस्त्र चक्र से बाहर फेंक दिए जाओगे. तनख़्वाह काफ़ी मोटी मिलती है. जीवन की छोटी-छोटी ख़ुशियों से, परिवार के सदस्यों से न जाने कब महरूम हो गए, पता ही नहीं चला. न जाने बच्चे कब बड़े हो गए, क्या-क्या डिग्रियाँ उन्होंने प्राप्त कर लीं, मैंने जाना ही नहीं. घर वापस आओ तो सभी अपने कामों में व्यस्त, या फिर सोए हुए मिलते. मुझे सुकून के कुछ पल मिलें, इसलिए कोई भी अपनी रोज़मर्रा की समस्याएँ मेरे पास नहीं लाता, मगर मैं तो, इसी कारण, अपनों से बेगाना हो गया. कभी-कभी तो जी करता है, कि यह सब छोड़कर चले जाओ, मगर क्या यह संभव है? नहीं, मुझे तो प्रतियोगिता के भय से घूमते ही रहना है, तेज़...और तेज़...

देर रात को कार में घर लौटते हुए सव्यसाची यही सब सोच रहा था. गनीमत थी कि कार ड्राइवर चला रहा था, वर्ना, अपने ही विचारों में डूबे-डूबे वह तो एक्सीडेंट ही कर बैठता.

याद आया उसे कॉलेज का ज़माना. सभी सहपाठी अधिक से अधिक धन अर्जित करने वाली नौकरी पाने की होड़ में प्रसिद्ध, सुप्रसिद्ध, अतिप्रसिद्ध मैनेजमेंट इन्स्टीट्यूट में दाखिला पाने के लिए तरस रहे थे. सव्यसाची भी जी तोड़ मेहनत कर रहा था. परिवार के सदस्यों को, ख़ासकर माता-पिता को काफ़ी उम्मीदें थीं उससे. उच्च-मध्यम वर्ग वाले परिवार का यह बेटा धनाढ्य वर्ग में शामिल होने के सपने देख रहा था.

उसके सपने पूरे भी हुए. कलकत्ता के मैनेजमेंट संस्थान में उसे प्रवेश मिल गया तो सभी ख़ुशी से फूले न समाए. यार-दोस्तों के अभिवादनों में छिपी ईर्ष्या के पुट को भी वह शीघ्र ही भूल गया. देखते-देखते, दो वर्ष बीतते-बीतते एक अत्यंत प्रसिद्ध मल्टीनेशनल कम्पनी में सव्यसाची को नौकरी भी मिल गई. ज़ाहिर था, शादी भी शीघ्र ही हो गई, सव्यसाची नौकरी में पदोन्नति प्राप्त करता रहा और पत्नी, शची, उसके हर मूड को संभालती, उसका साथ देती रही. परिवार की कोई भी समस्या क्यों न हो, चाहे बच्चों का एडमिशन हो, या कोई बीमार हो, या कोई पार्टी हो, या घर में ही कोई उत्सव हो, सभी कुछ तो संभाल लेती थी शची! सव्यसाची बस नौकरी करता, तरक्की पाता, कम्पनी की प्रतिष्ठा को संभालते हुए आगे बढ़ता रहता.

मगर उम्र तो बढ़ती है. पचास वर्ष की आयु प्राप्त करते-करते सव्यसाची को बड़ी तीव्रता से महसूस होने लगा, कि वह कुछ उकता गया है, उसी एकसार वातावरण से काफ़ी थक गया है, मगर मार्केट की जानलेवा होड़ में फुर्सत के चंद पल भी निकाल पाना असंभव था. शची सब कुछ देखती, मगर लाचार थी, उसे पति की प्रतिष्ठा, उसकी थकावट, मार्केट में दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही होड़ से अब कुछ भय-सा लगने लगा था. पति के पीछे साये की तरह रहना चाहती वह, मगर ऐसा करना संभव तो नहीं था.

प्रतिदिन की भाँति सव्यसाची सुबह-सुबह सैर को निकला. यही एक आदत थी, जो उसने अब तक छोड़ी नहीं थी. बल्कि यूँ कहिए कि शरीर की मशीन को चालू हालत में रखने के लिए यह प्रातःकालीन सैर बड़ी आवश्यक थी. सुबह पाँच बजे निकल जाता सव्यसाची और करीब घण्टे भर बाद वापस आकर अपनी दिनचर्या में लीन हो जाता.

मगर उस दिन साढ़े छह बज गए, सात, आठ, नौ भी बज गए, मगर सव्यसाची न लौटा. शची उसके टहलने के रास्ते से परिचित थी, स्वयँ कार निकलवाकर देख आई...नहीं, रास्ते में कहीं कोई दुर्घटना नहीं हुई थी. वापस आकर सभी परिचितों को फ़ोन किए, रिश्तेदारों से पूछा...कोई पता नहीं.

हार कर पुलिस में शिकायत दर्ज करनी ही पड़ी.

पुलिस में कम्प्लेंट लिखवाने की ही देर थी, कि सभी अख़बारों में, रेडिओ पर, दूरदर्शन पर सव्यसाची के गायब होने की ख़बर आ गई. पुलिस की खोज शुरू हो गई. उसके दोस्तों, दुश्मनों, कम्पनी के सहयोगी अफ़सरों से पूछताछ की गई. कम्पनी में सव्यसाची लोकप्रिय ही था, किसी से उसकी दुश्मनी भी नहीं थी. कोई अन्य कम्पनी इस कम्पनी को हड़पने की मंशा भी नहीं रखती थी. फिर...?
अस्पताल गए, हो सकता है, अति थकान के कारण सव्यसाची कहीं गिर तो नहीं गया? मगर कोई लाभ न हुआ. शची का रो-रोकर बुरा हाल था. निकटतम रिश्तेदार भी आ गए थे, बच्चे अलग परेशान थे, बड़ा बेटा लगातार टेलिफोन के पास बैठा रहा और छोटा बार-बार पुलिस थाने जाकर पूछ आता, कि उसके पापा की कोई ख़बर तो नहीं आई.

अब एक ही अनुमान लगया जा रहा था, कि हो न हो, सव्यसाची का अपहरण ही किया गया होगा. फिर...यदि वे धन की मांग करें तो, यदि कम्पनी के कोई भेद मालूम करना चाहें तो...

मगर अपहरण कर्ताओंकी ओर से कोई फोन भी नहीं आया.

एक दिन बीत गया. घर में किसी ने भी खाना नहीं खाया. दूसरा दिन भी बीता. आज समाचार पत्रों में और टी.वी. चैनल्स पर बस इतना कहा गया, कि सव्यसाची की अब तक कोई ख़बर नहीं मिली है.

तीसरा दिन...लगता था कि सभी प्रचार-प्रसार के माध्यम सव्यसाची को भूल गए हैं. फिर तो दिन बीतते रहे...सिर्फ परिवार वालों को छोड़कर कोई भी उसके लिए परेशान नहीं था.

और फिर...एक बार फिर अख़बार में सव्यसाची की फोटो छपी, वह लौट आया था, सकुशल!

परिचितों, सहयोगियों का तांता लग गया उसके घर. पुलिस वाले, सी.आई.डी. वाले सवाल पूछ-पूछकर अलग हैरान किए दे रहे थे. थक गया सव्यसाची दुहरतए-दुहराते, कि उसे नहीं मालूम, कि उसे कौन ले गया था, कहाँ और क्यों ले गया था.

उस दिन सुबह, जब वह सैर को निकला था, तो अचानक दो आदमियों ने उसे दबोच कर कार में डाल दिया और किसी अज्ञात स्थल की ओर ले चले. सव्यसाची को पीछे की सीट पर लिटा दिया गया, वह उठ नहीं पाए इसलिए वे ही दोनों, जिन्होंने उसे दबोच लिया था, उस पर बैठ गए. लिहाज़ा सव्यसाची देख ही नहीं पाया कि उसे कौन सी जगह ले जाया जा रहा है. गंतव्य तक पहुँचने पर उससे एक बड़ी रकम की माँग की गई, यह आदेश दिया गया कि वह अपने घर वालों को फ़ोन करके रकम पहुँचाने का बंदोबस्त करने के लिए कहे. सव्यसाची बोला कि यदि वह अपना घर और घर की एक-एक चीज़ भी बेच दे तब भी इतनी रकम प्राप्त नहीं कर सकता.

अपहरण कर्ताओं ने यह सोचकर, कि सव्यसाची की सांपत्तिक स्थिति का उन्होंने गलत अंदाज़ लगा लिया था, उसे आज़ाद करने का फ़ैसला कर लिया. उसे एक ट्रेन में बिठा दिया गया, जब कुछ देर बाद सव्यसाची कुछ संभला तो उसने खिड़की से झाँककर देखा और यह अनुमान लगाया कि वह कलकत्ता से अधिक दूर नहीं है. हावड़ा स्टेशन आते ही वह उतर गया और टैक्सी से अपने घर चला आया, बिना किसी खरोंच के, बिना किसी भय के लक्षण को ओढ़े. पुलिस एवम् पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर देते-देते वह इतना थक गया कि उसकी जीभ लड़खड़ाने लगी, आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा, वह बेहोशी के आलम में जाने लगा.

शची ने प्रार्थना की कि उसके पति का मानसिक तनाव समाप्त होने तक उनसे कोई प्रश्न न किए जाएँ. वे थक गए हैं, उन्हें आराम की सख़्त ज़रूरत है.

सभी चले गए. सव्यसाची ने लम्बी तान दी, करीब दो घण्टे बाद वह उठा तो देखा कि बच्चे अपने-अपने काम पर चले गए हैं, रसोईघर से सोंधी-सोंधी ख़ुशबू आ रही है. वह उठा, झटपट स्नान करके किचन में आया और पीछे से आकर पत्नी का आलिंगन करते हुए बोला: “मान गया, तुम्हें! सचमुच, बड़ा आराम किया पूरे हफ़्ते! सारी थकान निकल गई! अब बढ़िया-सा खाना खिला दो, आज का दिन आराम करके कल से ऑफ़िस जाऊँगा.”

पत्नी भी मुस्कुरा रही थी. खाना खिलाते हुए बोली, “दूसरा उपाय भी तो न था. ना तो तुम छुट्टी लेते, ना कम्पनी तुम्हें छुट्टी देती. अपहरण हो जाने के बाद तो किसी का बस नहीं चलता न! बस, अब मुझे एक ही बात की चिंता ह, कहीं उन्हें सच का पता न चल जाए. वे यह न पूछ बैठें, कि क्या अपहरणकर्ताओं के पास पिस्तौल भी नहीं थी? उन्होंने तुम्हारे हाथ-पैर भी नहीं बांधे? तुम्हारे यह कहने पर कि तुम बड़ी रकम नहीं दे सकते, वे मान गए? तुम्हें छोड़ दिया? ट्रेन में बैठा दिया...एक खरोंच तक नहीं आई, चेहरे पर भय का कोई चिह्न तक नहीं! शायद, तुम कोई अच्छी सी कहानी गढ़ते...ख़ैर, फिक्र न करो, मैं सब संभाल लूँगी, मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगी...”

सव्यसाची मुस्कुराया, बोला, “तुम्हीं ने यह तरकीब सुझाई थी, मुझे दीदी के घर, गाँव भेजने की, आराम करने के लिए...अब तुम्हीं सब संभालना...तुम्हारी बुद्धि पर मुझे पूरा भरोसा है.”

इतना कहकर बेताल चुप हो गया. विक्रम भी सोच में पड़ गया. बोला, “शायद शची ने ठीक ही किया था? जब घी सीधी उँगली से न निकले, तो कुछ न कुछ करना ही पड़ता है...तुम्हारा क्या ख़याल है, बेताल?”

“शायद, तुम ठीक कह रहे हो, विक्रम!” बेताल ने इस बार अलग जवाब दिया.

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Saturday, 22 September 2018

पूछे विक्रम, बोले बेताल - 10




10. मानव प्रेम
अफ़लातून


बाहर ज़ोरदार बारिश हो रही थी. विक्रम ने कहा, “बेताल, आज यहीं बैठकर बारिश का मज़ा लेते हैं, एक अलाव जला लेंगे, कुछ मूंगफलियाँ खाएँगे और तुम कुछ सुनाना.”

बेताल भी सहमत हो गया.दोनों अलाव के निकट बैठे और हल्की-हल्की गरमाहट से जब उनके चित्त प्रसन्न हो गए तो विक्रम ने कहा, “ बेताल, यह अग्निभी बड़ी रहस्यमय है, अभी, जब अलाव के रूप में है, तो बड़ी सुखद प्रतीत हो रही है, मगर यदि विराट रूप धारण कर ले तो विनाश का कारण बन जाए.”

“ठीक कहते हो, राजा विक्रम! अग्नि या आग या फिर अगन ही कह लो इसे, यदि घर के चूल्हे में ही सीमित रहे तो घर के सदस्यों के लिए भोजन देती है, मगर इसका चूल्हे से बाहर आना अनर्थ ढा देता है. फिर घर में आग लग जाती है.घर में आग कोई भी लगा सकता है: पड़ोसी, शत्रु या मित्र के रूप में अशुभचिंतक, या बहू, या सौतेली संतान. यदि कभी अनहोनी हो जाए तो घर के चिरागसे भी आग लग जाती है.

बेताल ने आगे कहा, “विक्रम. आजकल कई शब्दों के साथ अग्निया आगया अगनका प्रयोग किया जाता है, जैसे : बदले की आग, कामाग्नि, प्रेम-अगन, क्षुधाग्नि...”

“बस, बस,” विक्रम ने कहा, “मुझे ये सभी शब्द अच्छे नहीं लग रहे हैं.”

“तुम्हें अच्छे लगें या न लगें, राजाजी, मगर जीवन की व्याख्या सिर्फ शब्दों के माध्यम से ही की जाती है. सुनो, तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ. कहानी पुरानी है, सभी की जानी-पहचानी है:

“एक बार एक शब्दकोष में एक नन्हा-सा कीड़ा घुस गया. इस शब्द जाल में फँसकर वह घबरा गया, लोटने लगा, बाहर निकलने की कोशिश करने लगा, मगर कोई राहत न मिली. पृष्ठ-दर-पृष्ठ रेंगता रहा, कोई भी शब्द उसे बाँध न पाया. थका-हारा कीड़ा हाथ जोड़कर ईश्वर की प्रार्थना करने लगा, “हे सर्वशक्तिमान, यदि इस विराट वस्तु से मुझे मुक्ति नहीं दिलाना चाहते, तो यहीं कोई ठोर-ठिकाना बना दो मेरे लिए, मैं कहीं तो रुकूं, यूँ रेंगते-रेंगते, बिना अन्न-जल के मेरा होगा क्या!”

ईश्वर को उस पर दया आ गई और उन्होंने उसे बुद्धि प्रदान कर दी. अब वह शब्दों के अर्थ महसूस करने लगा, उन शब्दों में, जिन पर वह रेंगता, यदि कोई शब्द पसंद आ जाता तो वहीं कुछ देर ठहरता, सोचता और आगे बढ़ जाता. एक दिन वह पहुँचा बचपनशब्द पर. यह शब्द उसे बहुत भाया, उसने वहीं डेरा डालने का निश्चय कर लिया. अब कीड़ा बचपनशब्द वाली चौखट में रहने लगा. कभी-कभार वहाँ से घूमने निकलता और मिठाई, चॉकलेट, दूध, बाग, खेल, स्नेह, हँसना, खिलखिलाना, मुस्कुराना, पैर पसारना, ज़िद करना, सो जाना आदि शब्दों पर चला जाता और उनकी सैर करके वापस बचपनवाले ख़ाने पर लौट आता. चिंता, भय, ईर्ष्या-द्वेष आदि शब्दों के निकट भी वह न फटकता.

मगर एक दिन उसने सोचा, कि इस विराट वस्तु में इन शब्दों के अलावा भी तो कुछ और शब्द होंगे, क्यों न घूमकर देखूँ! वह पहुँचा पाठशालाशब्द पर और इसी शब्द पर अधिकांश समय बिताने लगा. अब पुस्तक, पाठ, परीक्षा, अध्ययन यही शब्द उसे भले लगते. पाठशालाशब्द को जब उसने भली-भाँति समझ लिया, तो वह चला विश्वविद्यालयशब्द की ओर. अब उसे बचपनशब्द वाला अपना चौख़ाना छोटा प्रतीत होने लगा, सो उसने यौवनशब्द पर घर बना लिया. यह जगह उसे उत्साह और शक्ति से भरपूर प्रतीत हुई. यहीं रहते-रहते प्रेमशब्द से उसका परिचय हुआ. मगर इस शब्द पर वह ऐसा रुका, कि उसके शब्दों की दिशा ही बदल गई. अब वह पुस्तक, वाचनालय, अध्ययन आदि शब्दों के चक्कर लगाना एकदम भूल गया.भूख, प्यास, खाना, सोना शब्दों पर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता. वह खोया रहता चांद, सितारा, बादल, सागर में. नींद शब्द के पास तक न फटकता.

“फिर क्या हुआ?” विक्रम की उत्सुकता बोल ही पड़ी.

“वही हुआ, जो भूखे प्यासे पड़े रहने से होता है. वह नन्हा-सा जीव मृत्यु नामक शब्द के पास गया और वहीं निश्चल पड़ा रहा. उसमें इतनी भी शक्ति न बची कि वहाँ से सरक पाता. वह वहीं पड़ा रहा. एक दिन उस किताब की सफ़ाई करने वाले ने उसे बाहर निकाल कर फेंक दिया.”

“यह तो बहुत बुरा हुआ. मैंने तो सुना था कि प्रेमशब्द में बड़ी शक्ति होती है. उस बेचारे का तो प्रेम ने ही बेड़ा गर्क कर दिया. अब अगर प्रेमशब्द की यही परिणति है, तो क्या फिर भी तुम कहोगे कि जीवन शब्दों का खेल है?”

“हाँ,” बेताल ने जवाब दिया. “देखो, राजाजी जीवन को कभी-न-कभी तो समाप्त होना ही है. उस समाप्त होने की प्रक्रिया में अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग शब्द-जालों से होकर गुज़रना पड़ता है. यहाँ नन्हा-सा जीव प्रेमके पश्चात् सागर, बादल, एकान्त... आदि शब्दों से गुज़रा, इसीलिए मृत्युतक शीघ्रता से पहुँच गया. यदि वह प्रेमके पश्चात् जीवन साथी, व्यवसाय आदि शब्दों पर पहुँचता तो फिर उसकी राह सुख, सम्पन्नता, दीर्घायु आदि शब्दों से होकर गुज़रती. शब्दों का चयन करना उसके वश में था. वह रास्ता भूल गया, इसीलिए उसका अंत दुखद रहा.”

“कहीं तुम ये तो नहीं कहना चाहते, कि प्रेम वरदान भी हो सकता है, और अभिशाप भी?”

“ठीक समझे, राजा जी! प्रेम तो एक उदात्त भावना है. वह मानव को शक्ति, चारित्रिक दृढ़ता, उदारता प्रदान करती है. ये ही गुण तो उसे आगे बढ़ने में सहायता प्रदान करते हैं. प्रेम को संकुचित न किया जाए, उसे मानव-प्रेम का रूप दे दिया जाए तो स्वार्थ, सत्ता-लोलुपता, बेईमानी इत्यादि शब्दों की शब्दकोष में आवश्यकता ही न रहेगी. कुछ समझे?”

“मुझे यह सब समझने में देर लगेगी, क्योंकि जिस प्रेम को मैं जानता हूँ, वह केवल मानव-प्रेम ही है. मगर मैं देख रहा हूँ, कि तुम काफ़ी दार्शनिक हो गए हो, आधुनिक जीवन को काफ़ी निकटता से देख रहे हो.ख़ैर, यह तो बताओ, कि अभी जिस मानव-प्रेम की सीमा की बात तुमने की, वहाँ तक क्या तुम्हारा आधुनिक मानव पहुँच पाएगा?”

“मालूम नहीं....” बेताल ने चिंता में डूबकर कहा.

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Thursday, 6 September 2018

पूछे विक्रम, बोले बेताल - 09



9. क्या यही है स्त्री-मुक्ति का तात्पर्य?

अफ़लातून

विक्रम और बेताल का आकाश-भ्रमण जारी था. सोच में डूबा विक्रम उन महिलाओं को भुला नहीं पा रहा था जो जानवरों से प्रेम करते हुए अपनी संतान का तिरस्कार कर रही थीं. विक्रम की ऐसी अवस्था को देखकर बेताल ने पूछ ही लिया, “तो, इन देवियों ने तुम्हारे दिल पर गहरी छाप छोड़ ही दी, राजा!”

“हाँ! भई, बेताल, मैं उनके ऐसे आचरण को समझने में असमर्थ हूँ. कौन हैं ये महिलाएँ? क्या भारतवर्ष की सभी महिलाओं का आचरण ऐसा ही है, या फिर ये किसी विशेष कोटि की विभूतियाँ हैं?”

“ठीक कहा, विक्रम! ये देवियाँ हैं महिला-मुक्ति की समर्थक...तुम इतनी जल्दी समझ नहीं पाओगे, राजा जी! संक्षेप में समझने के लिए कहानी सुनो विदुषी चन्द्रलेखा की:

चंद्रलेखा का ब्याह उसके माता-पिता ने बचपन में ही कर दिया था. सयानी होकर जब वह पति के घर आई, तो उसके अत्यंत साधारण रूप-रंग एवम् गुस्सैल स्वभाव के कारण पति ने उसे घर से निकाल दिया. चन्द्रलेखा ने माता-पिता पर बोझ बनने की अपेक्षा अपने पैरों पर खड़ा रहना उचित समझा और वह शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने गाँव को छोड़कर सौभाग्यपुर चल पड़ी. अध्ययन तो वह भली-भाँति करती रही, मगर अपने साधारण रूप एवम् परित्यक्ता के जीवन के कारण उसके हृदय में एक हीन भावना पनप रही थी. उससे किसी विवाहिता स्त्री का सुख देखा न जाता, साथ ही वह पुरुषों को लुभाने की चेष्टा करके यह सिद्ध करने का प्रयत्न भी करती कि वह आकर्षक है! चंद्रलेखा ने अपने मोहपाश में बांध लिया एक विवाहित पुरुष इन्द्रसेन को. गुरुकुल के, जहाँ वह अध्ययन करती थी, सभी नियमों का उल्लंघन करके वह इन्द्रसेन के साथ रंगरेलियाँ मनाने लगी. इन्द्रसेन के कुछ मित्रों ने इसकी सूचना उसकी पत्नी को दे दी. पत्नी सौदामिनी की भाँति आई, मगर न जाने कैसे, चन्द्रलेखा को उसके आगमन का ज्ञान हो गया था. वह कुछ समय के लिए अज्ञातवास में चली गई. इधर इन्द्रसेन ने भी अपनी अर्धांगिनी को समझा- बुझा कर वापस भेज दिया. अब तो चन्द्रलेखा विचारमग्न हो गई. उसने हर संभव उपाय से इन्द्रसेन को अपने मोहपाश में जकड़े रखने के उद्देश्य से यह निश्चय किया कि क्यों न इन्द्रसेन से संतान की प्राप्ति की जाए! ऐसा ही किया भी उसने! जब प्रसवकाल निकट आया तो विदुषियोंने चन्द्रलेखा से पूछ लिया कि उसका कोई पति है अथवा नहीं. यह जानकर कि चन्द्रलेखा बिन-ब्याही माँ बनने वाली है, वे बड़ी प्रसन्न हुईं!”

विक्रम से रहा न गया. वैसे ही चन्द्रलेखा की कहानी उसे क्षुब्ध किए जा रही थी. उसके मुख से निकल पड़ा “राम! राम!”

बेताल ने उसे रोका, “अमाँ, विक्रम, बीच में मत बोलो! पूरी कहानी तो सुन लो!”

विक्रम बोला, “कहते रहो!”

बेताल ने आगे कहना शुरू किया.

“चंद्रलेखा को कन्या-रत्न की प्राप्ति होने से कुछ ही पूर्व इन्द्रसेन अपने गाँव चला गया और फिर कभी लौटकर नहीं आया. चन्द्रलेखा ने भी उसे वापस बुलाने की चेष्टा नहीं की. मगर अब अपनी बेटी की ख़ातिर उसने एक विद्यालय में अध्यापन कार्य आरंभ कर दिया. सौभाग्यपुर का अध्ययन भी अभी अधूरा था.”

“ठीक ही तो है, रंगरेलियाँ मनाती रही तो पढ़ाई कैसे पूरी होती?”

“तुम फिर बोले!”

“अच्छा, कहो, आगे कहो!”

“कुछ मास बीतने के पश्चात् चन्द्रलेखा वापस सौभाग्यपुर आई. अपनी सखी को उसने बताया कि अकेले रहकर बेटी का पालन-पोषण करना वास्तव में कठिन है. यदि वह कभी बीमार हो जाए तो वैद्यजी को बुलाने के लिए भी घर में कोई नहीं है. उसे किसी पुरुष के सहारे की आवश्यकता है.”
सखी चौंक पड़ी, “पुरुष का सहारा? तुम्हें, चन्द्रलेखा? फिर स्त्री-मुक्ति का क्या होगा?”

“वह तो रहेगी ही. मैं कोई ब्याह करके पुरुष के आधीन थोड़े ही रहूँगी. वह तो बस, कामकाज में सहायता के लिए किसी के पास रह लूँगी.”

इतना कहकर बेताल कुछ रुका. मगर विक्रम ने अधीरता से कहा, “आगे क्या हुआ?”

“फिर चन्द्रलेखा ने एक और ब्याह रचाया. उसे इस बार एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई. मगर, चूँकि वह स्वभाव से ही उन्मुक्त थी सो यह ब्याह भी टिक नहीं पाया. अब वह अपनी दोनों संतानों के साथ रहती है और एक गुरुकुल में पढ़ाती है.

सौभाग्यपुर का अध्ययन अभी भी पूरा नहीं कर पाई है. अब भी शायद वृद्धावस्था में सुरक्षा की दृष्टि से और अपनी संतानों के भविष्य की ख़ातिर वह, शायद, एक-दो झूठे-झूठे ब्याह और रचा ले! मगर वह रहेगी मुक्त ही!”

इतना कहकर बेताल ने पूछा, “तो राजा जी, अब समझे स्त्री-मुक्ति का तात्पर्य?”

“हाँ, बेताल, भली-भाँति समझ गया. जब तक ब्याह नहीं होता, स्त्री पुरुष को लुभाए, उसे आनन्द दे, या उसका उपभोग करे, वह उसे प्रिय ही होगा. वांछित होगा. मगर जैसे ही विवाह हो जाए, वह उसी पुरुष-पति को त्यागकर फिर से स्वच्छन्द बन जाएगी, तितली की भाँति. मैं समझता हूँ कि स्त्री-मुक्ति से तात्पर्य पुरुष से मुक्ति न होकर पति से मुक्त होना है.

पति का द्वेष करना, उसे सताना, उसे छोड़ देना, उसका सदा विरोध करना यही लक्षण हैं स्त्री-मुक्ति के! क्यों बेताल, मैं ठीक समझा न?

“पता नहीं, विक्रम...” बेताल ने उत्तर दिया और वे आगे चल पड़े.

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Wednesday, 5 September 2018

पूछे विक्रम, बोले बेताल - 08






8. क्या जानवर बच्चों से बेहतर हैं?


‌‌‌‌‌‌‌-- अफ़लातून

उस दिन जब राजा विक्रम नियत स्थल पर पहुँचा तो बेताल को वहाँ न पाकर कुछ सुस्ताने लगा. कुछ ही क्षणों में चिर-परिचित हँसी की आवाज़ सुनाई दी. विक्रम ने कहा, “बड़ी देर लगा दी मित्र! क्या कहीं घूमने गए थे?”

बेताल बोला, “हाँ, और अब तुम्हें ले जाने आया हूँ. अकेले घूमने में मज़ा नहीं आ रहा था.”

“मगर मैं...” विक्रम ने कहना चाहा मगर बेताल उसे टोकते हुए बोला, “चिंता न करो, राजा जी, मैं तुम्हारे शरीर में प्रविष्ट हो जाता हूँ, आकाश मार्ग से चले चलेंगे, जहाँ रुकना चाहो, बता देना, मैं तुमसे बातें करने लगूँगा.”

दोनों चल पड़े. नीचे पृथ्वी पर नज़रें जमाए वे आकाश मार्ग से चले जा रहे थे. अचानक विक्रम ने कुछ शोकग्रस्त महिलाओं को देखा. उनमें से एक विदुषी के मुख पर शोक की गहरी छाया थी.

राजा ने अनुमान लगाया कि उसके साथ कोई दुर्घटना हुई है. दुखियारों का सहारा विक्रम विचलित हो उठा. राजा के दिल का हाल समझकर बेताल रुक गया. दोनों उन महिलाओं के वार्तालाप को सुनने लगे.

इतने में सामने से एक भद्र पुरुष उन महिलाओं के निकट आए तो विदुषी अपने आँसुओं को रोकते हुए बोली, “छोटा चल बसा!”

भद्र पुरुष ने आसमान की ओर हाथ उठाते हुए छोटेकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की.

राजा अपनी उत्सुकता को रोक न सका. पूछने लगा बेताल से, “क्या छोटा रोगग्रस्त था?”

बेताल ने जवाब दिया, “हाँ, लगभग तीन सप्ताह से बीमार था.”

“ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे! इन देवीजी की कितनी संतानें हैं?”

“बस एक ही पुत्र है, विद्वान, आज्ञाकारी और स्वस्थ्य भी है.”

“फिर, ये तो छोटेकी बात कर रही थीं?”

“तुम समझे कि छोटाइनका बेटा था? देखो राजा जी, आजकल माँ-बाप बच्चों से उतना प्यार नहीं करते, जितना पालतू जानवरों से करते हैं.”

“याने...?”

“हाँ, ‘छोटेसे उनका तात्पर्य था उस नन्ही सी कट्टो गिलहरी से जिसे उन्होंने अपने घर में पाल रखा था.”

“गिलहरी के निधन पर इतना दुख!”

“देख लो!”

आगे चले तो एक महिला को बाल बिखेरे, सिर झुकाए, हाथ बाँधे आँसू बहाते देखकर रुक गए. महिला खड़ी थी एक समाधि के सामने.

विक्रम बोला, “शायद किसी निकटतम व्यक्ति की समाधि है.”

“हा, हा, हा, खा गए न धोखा विक्रम भाई! यह समाधि है इन देवीजी के श्वान की!”

“घर में और कौन-कौन है?”

“अपना कहने को बस वही श्वान था, वह भी बूढ़ा होकर मर गया.”

विक्रम ने सोचते हुए कहा, “शायद अब भारतीय महिलाओं के मन में प्रेम का सागर हिलोरें ले रहा है. जब वे अपने पालतू प्राणियों से इतना स्नेह करती हैं, तो अपने घर के सदस्यों से कितना प्रेम करती होंगी!”

बेताल बोला, “राजा जी, इतनी जल्दी किसी निष्कर्ष पर न पहुँचना. एक-दो नज़ारे और देख लेते हैं. तुमने मृत प्राणियों के प्रति उनकी भावनाओं को तो देख लिया, अब जीवित प्राणियों के साथ उनका व्यवहार भी देख लो.”

विक्रम ने कहा, “चलो!”

उन्हें अधिक दूर नहीं जाना पड़ा. निकट ही एक जमघट देखा...कुछ पिंजरे, पिंजरों में मर्कट...एक इमारत से पिंजरों को बाहर धकेलते हुए कुछ व्यक्ति, उनको निर्देश देती एक महिला.

विक्रम ने देखा बेताल की ओर! बेताल ने बताना शुरू किया, “यह एक प्रयोगशाला का भवन है. यहाँ विभिन्न रोगों से जूझने की औषधियाँ बनाई जाती हैं. उनके प्रयोग पहले किए जाते हैं वानरों पर, चूहों पर, श्वानों पर, और तभी मनुष्यों को ये औषधियाँ दी जाती हैं.”

“तो फिर, समस्या कया है?” विक्रम ने पूछ लिया.

इन महिलाओं का कहना है, कि जिन पशुओं पर प्रयोग किए जा रहे हैं, उनकी देखभाल भली-भाँति नहीं की जा रही है. उनके रहने के पिंजरे छोटे-छोटे हैं, उन्हें समुचित सुविधाएँ प्रदान नहीं की जा रही हैं. अतः यह महिला सभी जानवरों को दूर जंगल में ले जाकर छोड़ने का आदेश दे रही है. कहो, क्या कहते हो?”

विक्रम ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला ही था कि उसकी आँखों के सामने एक किशोर का चेहरा तैर गया. बालक अकेला, उदास, रसोईघर में खड़ा खाना बना रहा था. राजा को आश्चर्य हुआ, नन्हा-सा बालक, अकेला, खाना किसके लिए बना रहा है?

कुछ ध्यान से देखा तो पाया कि बालक के पिता मुँह में सिगरेट दबाए तैश में किसी से झगड़ रहे थे, माँ, सजी-सँवरी, चमकती-दमकती-इठलाती कुछ लिख रही थी.

बेताल हाज़िर था इस सबका मतलब समझाने के लिए, “राजा जी, इस बालक की माँ बड़ी अफ़सर है, पिता को झगड़ा करने से फुर्सत नहीं, बालक अपने बचपन को भुलाकर सभी के लिए कुछ खाना बना रहा है. यदि खाने के समय तक कुछ बन न पाया तो उसे मार पड़ेगी पिता से, और गालियाँ सुनेगा महिमा-मंडित माँ से! पढ़ाई-लिखाई भी करनी पड़ती है, माँ की इज़्ज़त का सवाल जो है!”

विक्रम गहरी सोच में डूब गया. बेताल ने ही चुप्पी को तोड़ा, “अब बोलो, राजा विक्रम, तुम इन महिलाओं के प्रेमपूर्ण व्यवहार की तारीफ़ कर रहे थे. अब कहो, मैं सुनूँगा.”

“क्या कहूँ, बेताल! जानवरों को सुख-सुविधा देने वाली, उनकी मृत्यु पर शोक-विह्वल होने वाली ये महिलाएँ अपनी ही संतान के प्रति इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती हैं?”

“निष्ठुर होती हैं, यह तो तुमने देख लिया. शायद यह पशु-प्रेम प्रसिद्धि पाने के लिए ही है. वरना अपने पुत्र को कौन सी माँ दुख देगी?”

“रुको, बेताल, कहीं वह उसका सौतेला बेटा तो नहीं?”

“नहीं, राजा, बिल्कुल सगा है वह बेटा. मैं तो सोचता हूँ, कि उस महिला को शादी-ब्याह का बंधन रास नहीं आया. बच्चा शायद उसके पैरों की जंज़ीर बन गया है!”

“हो सकता है, मगर मैंने तो ऐसी बात अपने राज्य में कभी देखी-सुनी नहीं. इस नगर को देखकर तो यूँ प्रतीत होता है कि वानरों-श्वानों-मूषकों का जीवन मानव-जीवन की अपेक्षा अधिक सुखकर है. कहीं यह बालक भी यही तो नहीं सोच रहा है, कि काश मैं भी वानर होता या श्वान होता, तब तो माँ के स्नेह की छाया मुझे मिलती?”

“मालूम नहीं...” बेताल का जवाब था.

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पूछे विक्रम, बोले बेताल - 12

12. राजनीति में झूठ अफ़लातून  उस दिन टहलते-टहलते विक्रम और बेताल पहुँच गए सौभाग्य नगर के विमानपत्तन के निकट. देखा कि चारों ओर बड़...